अन्तर्ज्ञान

बीस दिन
सात शहर।
बीस दिन।
वडोदरा -> नाग्पुर -> दिल्ली -> चंडीगढ़ -> हैदराबाद -> गुवाहाटी -> मुंबई
गुजराती -> मराठी -> हिन्दी-> पंजाबी -> तेलुगु -> अस्सामी -> मराठी
दस हजार तीन सौ तेरेसठ किलो मीटर।

समर्खंड का नाटक

समर्खंड का नाटक देखे मै नदी के ओर चला
उस पहाड़ के पीछे छुपते जल्दी सोने भोर चला
समर्खंड के नाटक ने मन मोहा और धन पाया था
उस विशाल नगर को उसने अजब विप्धा से बचाया था।

समर्खंड के नाटक से प्रेरित बड़े धनवान भी थे
उग्र पिशाच सा था परमाणु उग्र विचार सराहे थे
समर्खंड के नाटक से एक ऐसा प्रचंड तीर छूता
क्रूर नगर की क्रूरता को उस नदी में मैं जा ले कूदा।

तू त्रिमूर्ति

याद आती है,
तेरी याद आती है,
अंधेरे की पहली ज्योति,
दुनिया को समेटी गठरी,
तू त्रिमूर्ति,
तेरी याद आती है।

पगडण्डी से हटके,
आंखों से छुपके,
उस दूधवाले के सामने,
नाई के पीछे,
तू त्रिमूर्ति,
तेरी याद आती है।

तू ही तो था,
महानता का स्तंभ,
ग्यान का देवता,
अभियांत्रिकी का आरम्भ।
तू त्रिमूर्ति,
तेरी याद आती है।

तू जब न था
दो साल का अवकाश लिए,
किस्मत भी गया तेरे संग,
टाटा और गुड बाय किए।
तू त्रिमूर्ति,
तेरी याद आती है।

बड़ी मन्नतों के बाद,
तू लौटा एक सर्दी की रात में,
हम सब मिलने आए तुझे,
अपने पप्पाओं की कमाई लिए साथ में।

ज़माना बदला था,
मौसम ख़राब था,
फिल्में तो बकवास ही बकवास,
तूने क्या दारु पिया था?

कहाँ गया वो तेरा टॉप १०,
फेस ऑफ़ की गोली, देस्पेरादो का गन,
अब दिखाई तुने सिर्फ़ कूल सर्फेस,
मदमस्त टेरी दिखाती बेशरम तन।

लेकिन तुझमे जान बाकी था
उस पूनम की रात में,
विदाई की सौगात लिए,
तूने जुगाडा आइस वाइड शट था।

अब साल गए, महीने खोये,
फिल्में आए, फिल्में गए,
मल्टीप्लेक्स में गिरे, पोपकोर्न पे रोये,
तेरी बात अलग थी, तू महान था।
तू त्रिमूर्ति।
तेरी याद आती है।
तेरे बाद भी आती है।

एक नई, पुरानी भाषा।

अचानक मुझे पता चला की लेखन में ज़्यादा शब्दों का उपयोग नही है। न है कोई खास ज़रूरत क्रियाशीलता का। लेखनी की सबसे कीमती ज़रूरत है तैयारी। यह तैयारी दो-चार दिन में नही हो सकती है। दो-चार साल कम पड़ सकते हैं।
आप पूछेंगे मैं क्यूँ इतनी गंभीर भाषा में लिख रहा हूँ। यह मेरा तीसरा हिन्दी निबंध है एक हफ्ते में। यह मेरा तीसरा हिन्दी निबंध है कुछ पन्द्रह सालों में। इन पन्द्रह सालों में काफ़ी कुछ बदला, मैंने काफ़ी कुछ सीखा और बहुत भूला। सही हिन्दी उनमे से एक चीज़ है जो मैंने भूला, लेकिन कुछ हद तक सही लेखन सीखा, अंग्रेज़ी में लिखते हुए। और जब मैं हिन्दी में लिखने की सोच रहा था, तब मुझे यूँ लगा की लेखन तो लेखन है, चाहे हिन्दी हो या अंग्रेज़ी। हमारी सोच तो वही है।
लेकिन दो दिन में पता चल गया की भाषाओँ के अपने नियम होते हैं। व्याकरण अलग बात है। नियम से मेरा मतलब अलग है। जो मैं अंग्रेज़ी में सोचता और लिखता हूँ, वह चाहे कितना भी अच्छा हो, मुझे हिन्दी में उसी को लिखने के लिए अनुवाद की नही, अलग सोच की ज़रूरत पड़ेगी। इसी कारन मेरे काफ़ी कोशिशों के बाद मैं इस नतीजे पे पहुँचा हूँ की हास्य भरे लेखन अभी के लिए हिन्दी में कम ही लिख पाऊँगा। क्यूँ? क्यूंकि हास्य लेखन का आखरी अध्याय है। जब सब सीख गए, तब बचा क्या रहता है, बस मज़ाक उडाना।
मैंने अंग्रेज़ी सीखने के लिए बहुत वक्त लगाया। शुरू में लिखने के तुंरत बाद मुझे उस लेखन से चिढ आता था। धीरे धीरे वह समय बढ़ता गया जितना मुझे अपने लेखन से घिन आने में लगता था। अभी कुछ ऐसे लेखन हैं जो अगर मेरे अंग्रेज़ी के अध्यापकों ने मुझसे बदलने कहा तो मैं न बदलूँ। मेरे लिखते लिखते मेरा अपना एक व्याकरण बना है जिससे मैं संतुष्ट हूँ। अगर वह अंग्रेज़ी ही न हो तो भी ठीक है।
अब बारी है हिन्दी की। आशा है की एक-दो साल बाद मैं हिन्दी में भी अपना व्याकरण बना सकूँ जिससे मैं संतुष्ट रहूँ। अभी के लिए, नए नए निबंध लिखके मेरे चिढ और घिन को पृष्ठ के नीचे दबाते जाना है, बस।

चींटियों का दी एंड

आज चींटियों का पतन हुआ। काफ़ी देर से देख रहा था उनको। खिड़की से लम्बी लाइन बनाके आते थे, धीरे से दीवार को पार करते कंप्यूटर टेबल पर चढ़ते थे। प्रिंटर के सामने से निकलके सी पी यू तक पहुँचते। वहाँ हज़ार वायर हैं, कौन कहाँ जाता है ख़ुद मुझे आइडिया नही है। वायर से तो उनकी चांदी थी। सीधा कीबोर्ड का नॉन स्टाप लाइन पकड़ के अक्षरों और अंकों के नीचे जा छुपते। मैंने भी काफ़ी उनको समझाने की कोशिश की। माने नही, चींटी हैं, आदमी नही। अलमारी में ढूंडा तो लक्ष्मण रेखा मिला। एक गोल सा आकर बनाया चींटियों को घेरके। दो मिनट में उनकी संख्या दो हजार से घटके चार हो गई है।
कितना समझाया तुमको, सुना नही। साला।

अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ

मेरे एक दोस्त ने मुझसे काफ़ी साल पहले कहा था कि अग्निपथ में अमिताभ बच्चन की जो आवाज़ है वह उन्होंने दवूद को आधार रखकर तैयार किया था। उसने और बहुत सी बातें कही थी जो मै याद भी नही करना चाहता। वह लड़का ही कुछ ऐसा था, बकवास उसका दूसरा नाम था। लेकिन बड़े दिनों बाद जब मैंने अग्निपथ पूरे विस्तार से देखा तो सोचा, अगर दवूद इससे आधा भी गरम हो सकता है, तो उसको बम कि ज़रूरत नही पड़ेगी।

हईं साला

ये साला


हिन्दी सिनेमा में हैं ही एक आद जिन्हें कलाकार का दर्जा दिया जा सके। रजाक खान तोह उनमे शामिल हैं जिनकी बात हम किसी और दिन करेंगे, लेकिन जिस किसीने भी अग्निपथ का संभाषण लिखा है, वह कलाकार है। बच्चन कि तोह बात ही अलग है। कोशिश करें आप सब किसी राह चलते दिनकर राव पे ये कहके “हवा तेज़ चलता है दिनकर राव, टोपी संभालो उड़ जाएगा”। अगर उस आदमी (या औरत) ने “हैं जी?” न कहा तो आप भी कलाकार।

अग्निपथ कि सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह एक बकवास फ़िल्म होने के बावजूद आप उसे फिर से देखना चाहते हैं। सही मैं, अगर आप सोचें, इन्ही बच्चन साहब के मुम्बैया कहावतों को यदि सतीश कौशिक के तेरे संग मैं चलायें तो वह भी देखने लायक हो सकती है। सोचें, जब वह लड़की कहती है “मै तुम्हारे बच्चे कि माँ बन्ने वाली हूँ” तब अगर वह लड़का बच्चन साहब कि आवाज़ मैं जवाब दे “हवा तेज़ चलता है लड़की, तकिया संभालो उड़ जाएगा” तो क्या हो? हमें तो मज़ा आएगा, लेकिन कोई ज़रूर पिटेगा।

मैंने ऐसे कुछ सुनहरे सम्भषानों को चुना है जो अग्निपथ से हमें सीखने मिले। तो नीचे लिखेला है, बरोबर पढ़नेका, एकदम मास्टरजी के माफिक, हैन।

विजय दीनानाथ चौहान। बाप का नाम, दीनानाथ चौहान। माँ का नाम, सरस्वती चौहान। उमर पैंतीस साल, ८ महीने, १६ दिन… ये ८-वां घंटा चालु है।

देखो! सोचो! यह लड़का, चिंगारी, कल बड़ा होके, हम सबको जला दिया, तोह क्या करेंगे, क्या करेंगे हम?
दुनिया में जिंदा रहने के लिए ना बोलना बहुत ज़रूरी है, मालूम!
ये, बैठो नीचे, बैठो, किधर जाता है तुम, नीचे अंगार लगा है क्या?
हाँ काका, टेम आ गया, आ गया टेम।
हे कांचा, साथ में अपने टेलर का बिल भी भेजना, तुम्हारा कपड़ा पहननेका स्टाइल हमको बहुत पसंद आया।
मास्टरजी, एकदम मास्टरजी, मास्टरजी के जैसा बात करता है साला।
पगार बढाओ, ये पुलीसवालों का पगार बढाओ। बारह सौ रुपये में घर नही चलता, ईमान क्या चलेगा!
वृक्ष हों बड़े भले ,
हों घने हों भले,
एक पत्र चाह भी मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ

तू न थमेगा कभी न मुड़ेगा कभी तू न रुकेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ।

2 thoughts on “अन्तर्ज्ञान”

  1. Gosh Vivek! This is stunning!I just read Trimurti and mean to read the rest. Authentic stuff! Doodhwaale ke saamne, nai ke peeche…..

    Mr. Rana, this is my experimental part of the blog 🙂 I lost touch with Hindi long back. 10 years, almost. Trimurti was the first piece that I really meant to write. It is about a video hall in the town I studied. There was a doodhwala and there was a nai, so all true. There was also a rumour that if caught watching films in that hall, you’d be paraded around town. That didn’t happen but.

  2. Wow, this piece of writing is fastidious, my
    younger sister is analyzing these kinds of things, thus I am
    going to inform her.

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